32+ Desh Bhakti Kavita देश भक्ति कविता Heart Touching Poem - song-lyricslink: healthy food and lyrics

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Monday, August 1, 2022

32+ Desh Bhakti Kavita देश भक्ति कविता Heart Touching Poem

 

Desh Bhakti Kavita देश भक्ति कविता

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Desh Bhakti Kavita देश भक्ति कविता

List / तालिका:-----

1. Azadi आज़ादी

2. Bharat Ki Aarti भारत की आरती

3. Desh Hamara देश हमारा

4. Swadeshi स्वदेशी

5. Sarfaroshi ki Tamanna सरफ़रोशी की तमन्ना

6. Ekta Ki Pukar एकता की पुकार

7. Neya Bharat नया भारत

8. Jhansi Ki Rani झांसी की रानी

9. Neya Daur नया दौर

10. A Mere Watan Ke Logo ऐ मेरे वतन के लोगो

11. Swatantata स्वतन्त्रता

12. Veer Jawan वीर जवान

13. 15 august 1947 पन्द्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस

14. Pyare Bharat Desh प्यारे भारत देश 

15. Lalkar ललकार

16. Mera Watan Wohi Hai मेरा वतन वही है

17. Sare Jahan Se Accha सारे जहाँ से अच्छा

18. Gandhi Ke Desh Mein गांधी के देश में

19. Yeh Hai Bharat Desh Hamara यह है भारत देश हमारा

20. Matribhumi मातृभूमि

21. Bharat Zameen Ka Tukda Nahi भारत जमीन का टुकड़ा नहीं

22. Jhanda Uncha Rahe Hamara झंडा ऊंचा रहे हमारा

23. Phaansi फांसी 

24. Hame Mili Azadi हमें मिली आज़ादी

25. Shahid शहीद

26. Hum Honge Kamyab हम होंगे कामयाब

27. Vande Mataram वंदे मातरम्

28. Ekla Cholo Re एकला चलो रे

29. Kadam Kadam Badhaye Ja कदम कदम बढ़ाये जा

30. Bharatmata भारतमाता

31. Bharatvarsh भारतवर्ष

32. Desh Bhakti Poem Status देश भक्ति कविता स्टेटस 

i) आजादी के साल हुए कई

ii) लाखो बलिदान करोडो अरमान के बाद

iii) वीर तुम बड़े चलो

iv) अपना झंडा हमको ज्यादा प्यारा

v) भारत तुझसे मेरा नाम है, भारत तू ही मेरा धाम है

vi) तुम रहते हो जब बॉर्डर पर


1. Azadi आज़ादी | Desh Bhakti Kavita

--- राम प्रसाद बिस्मिल


इलाही ख़ैर! वो हरदम नई बेदाद करते हैं,

हमें तोहमत लगाते हैं, जो हम फ़रियाद करते हैं।


कभी आज़ाद करते हैं, कभी बेदाद करते हैं।

मगर इस पर भी हम सौ जी से उनको याद करते हैं।


असीराने-क़फ़स से काश, यह सैयाद कह देता,

रहो आज़ाद होकर, हम तुम्हें आज़ाद करते हैं।


रहा करता है अहले-ग़म को क्या-क्या इंतज़ार इसका,

कि देखें वो दिले-नाशाद को कब शाद करते हैं।


यह कह-कहकर बसर की, उम्र हमने कै़दे-उल्फ़त मंे,

वो अब आज़ाद करते हैं, वो अब आज़ाद करते हैं।


सितम ऐसा नहीं देखा, जफ़ा ऐसी नहीं देखी,

वो चुप रहने को कहते हैं, जो हम फ़रियाद करते हैं।


यह बात अच्छी नहीं होती, यह बात अच्छी नहीं करते,

हमें बेकस समझकर आप क्यों बरबाद करते हैं?


कोई बिस्मिल बनाता है, जो मक़तल में हमंे ‘बिस्मिल’,

तो हम डरकर दबी आवाज़ से फ़रियाद करते हैं।


चिर प्रणम्य यह पुष्य अहन, जय गाओ सुरगण,

आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन !

नव भारत, फिर चीर युगों का तिमिर-आवरण,

तरुण अरुण-सा उदित हुआ परिदीप्त कर भुवन !

सभ्य हुआ अब विश्व, सभ्य धरणी का जीवन,

आज खुले भारत के संग भू के जड़-बंधन !


शान्त हुआ अब युग-युग का भौतिक संघर्षण,

मुक्त चेतना भारत की यह करती घोषण !

आम्र-मौर लाओ हे ,कदली स्तम्भ बनाओ,

पावन गंगा जल भर के बंदनवार बँधाओ ,

जय भारत गाओ, स्वतन्त्र भारत गाओ !

उन्नत लगता चन्द्र कला स्मित आज हिमाँचल,

चिर समाधि से जाग उठे हों शम्भु तपोज्वल !

लहर-लहर पर इन्द्रधनुष ध्वज फहरा चंचल

जय निनाद करता, उठ सागर, सुख से विह्वल !


धन्य आज का मुक्ति-दिवस गाओ जन-मंगल,

भारत लक्ष्मी से शोभित फिर भारत शतदल !

तुमुल जयध्वनि करो महात्मा गान्धी की जय,

नव भारत के सुज्ञ सारथी वह नि:संशय !

राष्ट्र-नायकों का हे, पुन: करो अभिवादन,

जीर्ण जाति में भरा जिन्होंने नूतन जीवन !

स्वर्ण-शस्य बाँधो भू वेणी में युवती जन,

बनो वज्र प्राचीर राष्ट्र की, वीर युवगण!

लोह-संगठित बने लोक भारत का जीवन,

हों शिक्षित सम्पन्न क्षुधातुर नग्न-भग्न जन!

मुक्ति नहीं पलती दृग-जल से हो अभिसिंचित,

संयम तप के रक्त-स्वेद से होती पोषित!

मुक्ति माँगती कर्म वचन मन प्राण समर्पण,

वृद्ध राष्ट्र को, वीर युवकगण, दो निज यौवन!


2. Bharat Ki Aarti भारत की आरती | Desh Bhakti Kavita

--- शमशेर बहादुर सिंह


देश-देश की स्वतंत्रता देवी

आज अमित प्रेम से उतारती ।


निकटपूर्व, पूर्व, पूर्व-दक्षिण में

जन-गण-मन इस अपूर्व शुभ क्षण में

गाते हों घर में हों या रण में

भारत की लोकतंत्र भारती।


गर्व आज करता है एशिया

अरब, चीन, मिस्र, हिंद-एशिया

उत्तर की लोक संघ शक्तियां

युग-युग की आशाएं वारतीं।


साम्राज्य पूंजी का क्षत होवे

ऊंच-नीच का विधान नत होवे

साधिकार जनता उन्नत होवे

जो समाजवाद जय पुकारती।


जन का विश्वास ही हिमालय है

भारत का जन-मन ही गंगा है

हिन्द महासागर लोकाशय है

यही शक्ति सत्य को उभारती।


यह किसान कमकर की भूमि है

पावन बलिदानों की भूमि है

भव के अरमानों की भूमि है

मानव इतिहास को संवारती।


3. Desh Hamara देश हमारा | Desh Bhakti Kavita

--- मनमोहन


देश हमारा कितना प्यारा

बुश की भी आँखों का तारा

 

डण्डा उनका मूँछें अपनी

कैसा अच्छा मिला सहारा

 

मूँछें ऊँची रहें हमारी

डण्डा ऊँचा रहे तुम्हारा

 

ना फिर कोई आँख उठाए

ना फिर कोई आफ़त आए

 

बम से अपने बच्चे खेलें

दुनिया को हाथों में ले लें

 

भूख ग़रीबी और बेकारी

ख़ाली -पीली बातें सारी

 

देश-वेश और जनता-वनता

इन सबसे कुछ काम न बनता

 

ज्यों-ज्यों बिजिनिस को चमकाएँ

महाशक्ति हम बनते जाएँ

 

हम ही क्यों अमरीका जाएँ

अमरीका को भारत लाएँ

 

झुमका ,घुँघटा,कंगना,बिन्दिया

नबर वन हो अपना इण्डिया

 

हाई लिविंग एण्ड सिम्पिल थिंकिंग

यही है अपना मोटो डार्लिंग

 

मुसलमान को दूर भगाएँ

कम्युनिस्ट से छुट्टी पाएँ

 

अच्छे हिन्दू बस बच जाएँ

बाक़ी सारे भाड़ में जाएँ ।


4. Swadeshi स्वदेशी | Desh Bhakti Kavita

--- दिनेश


अब तो खादी से प्रेम बढ़ाओ, पिया!

कहा मानो, विदेशी न लाओ पिया!


अब विदेशी वस्त्र से मुझको भी नफ़रत हो गई,

देश की संपत्ति विदेशों में से बहुत-सी ढो गई,

ज़रा भारत की दौलत बचाओ, पिया!


अब स्वदेशी वस्त्र से अपना शरीर सजाइए,

और मेरे वास्ते साड़ी स्वदेशी लाइए,

मुझे खादी का चादर ओढ़ाओ, पिया!


दीन-दुखियों का यही दुख दूर कर सकती, पिया!

गर्व भी परदेसियों का चूर कर सकती, पिया!

लाज अंगों की मेरे बचाओ, पिया!


जब तलक जिं़दा रहें तन पर रहे देशी वसन,

बाद मरने के उसी का, चाहिए हमको कफ़न,

यह संदेशा सभी को सुनाओ, पिया!


चाहते हो देश की गर कुछ भलाई तो ‘दिनेश’

तुम स्वदेशी वस्त्र पहनाकर स्वदेशी हो सुवेश,

वीरता आप अपनी दिखाओ, पिया!


5. Sarfaroshi ki Tamanna सरफ़रोशी की तमन्ना | Desh Bhakti Kavita

--- बिस्मिल अज़ीमाबादी


सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।

देखना है ज़ोर कितना, बाज़ु-ए-कातिल में है?


करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,

देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

ऐ शहीदे-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,

अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान,

हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है

खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,

आशिक़ोँ का आज जमघट कूच-ए-क़ातिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।


है लिये हथियार दुश्मन, ताक में बैठा उधर

और हम तैय्यार हैं; सीना लिये अपना इधर।

खून से खेलेंगे होली, गर वतन मुश्किल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।


हाथ, जिन में हो जुनूँ, कटते नहीं तलवार से;

सर जो उठ जाते हैं वो, झुकते नहीं ललकार से।

और भड़केगा जो शोला, सा हमारे दिल में है;

सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।


हम तो निकले ही थे घर से, बाँधकर सर पे कफ़न

जाँ हथेली पर लिये लो, बढ चले हैं ये कदम।

जिन्दगी तो अपनी महमाँ, मौत की महफ़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।


यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल, कह रहा है बार-बार;

क्या तमन्ना-ए-शहादत, भी किसी के दिल में है?

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब;

होश दुश्मन के उड़ा, देंगे हमें रोको न आज।

दूर रह पाये जो हमसे, दम कहाँ मंज़िल में है


वह जिस्म भी क्या जिस्म है, जिसमें न हो ख़ून-ए-जुनूँ;

तूफ़ानों से क्या लड़े जो, कश्ती-ए-साहिल में है।


सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है;

देखना है ज़ोर कितना, बाज़ु-ए-कातिल में है।


6. Ekta Ki Pukar एकता की पुकार | Desh Bhakti Kavita

--- अज्ञात रचनाकार


कृष्ण या करीम की कुदरत अलग कोई नहीं,

अल्लाह या ईश्वर, तेरी सूरत अलग कोई नहीं।


पान गंगा-जल करो, या आबे ज़म ज़म को पियो,

जल तत्व इनमें एक है, रंगत अलग कोई नहीं।


महादेव तो मंदिर मंे हैं, और मुस्तफ़ा मस्जिद में,

है पुरान-कुरान की आयत अलग कोई नहीं।


राम या रहमान हो, एक सीप के मोती हैं दो,

मुल्ला-पुजारी की है इबादत अलग कोई नहीं।


नरक या दोज़ख़ बुरे हैं, पापियांे के वास्ते,

हिंदुओं के स्वर्ग से जन्नत अलग कोई नहीं।


हिंदू, मुस्लिम, पारसी, ईसाई, यहूदी, क्रिश्चियन,

एक पिता के पुत्र हैं, माता अलग कोई नहीं।


7. Neya Bharat नया भारत | Desh Bhakti Kavita

--- महेन्द्र भटनागर


संघर्षों की ज्वाला में

हँस-हँस,

नव-निर्माणों के गीत

उमंगों के तारों पर

जन-जन गाता है,

भारत अपने सपनों को

सत्य बनाता है !


मज़बूत इरादों को लेकर

श्रम-रत हैं नर-नारी,

उगलेगा फ़ौलाद भिलाई

झूमेगी क्यारी-क्यारी !


बदला कण-कण भारत का,

बदला जीवन भारत का !


भागे मूक उदासी के साये

उल्लासों के सूरज चमके हैं,

युग-युग के त्रास्त सताये

मुरझाये मुखड़े दमके हैं !


दुर्भाग्य दफ़न अब होता है,

उन्मुक्त गगन अब होता है !

कलियाँ खिलने को तरसायीं जो,

गदराई अमराई में

भोली-भोली कोयल

मन के गीत न गा पायी जो,

अब तो

आँगन-आँगन कैसा मौसम आया !

कलियाँ नाचीं,

कोयल ने मन-भावन गायन गाया !


जीवन में अभिनव लहरें हैं,

चंदन से बुद्बुद् छहरे हैं !


क्रोधित चम्बल

खिल-खिल हँसती है,

बाँधों की बाहों में

अलबेली-सी

अपने को कसती है !

लो हिन्द महासागर से

बादल घिर आया,

धानी साड़ी पहन

धरा ने आँचल लहराया !

जीवन के बीज नये

अब बोता भारत है !

मानवता के हित में

रत होता भारत है !


8. Jhansi Ki Rani झांसी की रानी | Desh Bhakti Kavita

--- सुभद्राकुमारी चौहान


सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।


चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।


वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।


महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।


चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,

किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,

रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।


निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,

लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।


अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,

व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,

राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।


रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,

कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,

उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?

जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।


बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,

उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,

‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।


यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।


हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,

यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,

मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,


जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।


लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,

रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।


ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,

विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।


अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,

युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।


पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।


घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,

हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,


दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।


तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥


9. Neya Daur नया दौर | Desh Bhakti Kavita

--- साहिर लुधियानवी 


ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का

इस देश का यारों क्या कहना, ये देश है दुनिया का गहना


यहाँ चौड़ी छाती वीरों की, यहाँ भोली शक्लें हीरों की

यहाँ गाते हैं राँझे मस्ती में, मचती में धूमें बस्ती में


पेड़ों में बहारें झूलों की, राहों में कतारें फूलों की

यहाँ हँसता है सावन बालों में, खिलती हैं कलियाँ गालों में


कहीं दंगल शोख जवानों के, कहीं करतब तीर कमानों के

यहाँ नित नित मेले सजते हैं, नित ढोल और ताशे बजते हैं


दिलबर के लिये दिलदार हैं हम, दुश्मन के लिये तलवार हैं हम

मैदां में अगर हम डट जाएं, मुश्किल है कि पीछे हट जाएं

 Desh Bhakti Poem In Hindi


10. A Mere Watan Ke Logo ऐ मेरे वतन के लोगो | Desh Bhakti Kavita

--- कवि प्रदीप 


ऐ मेरे वतन के लोगों, तुम खूब लगा लो नारा,

ये शुभ दिन है हम सब का लहरा लो तिरंगा |


प्यारा पर मत भूलो सीमा पर वीरों ने है प्राण गँवाए,

कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट के घर ना आए |


ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी,

जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुरबानी |


जब घायल हुआ हिमालय ख़तरे में पड़ी आज़ादी,

जब तक थी साँस लड़े वो फिर अपनी लाश बिछा दी|


संगीन पे धर कर माथा सो गए अमर बलिदानी,

जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुरबानी |


जब देश में थी दीवाली वो खेल रहे थे होली,

जब हम बैठे थे घरों में वो झेल रहे थे गोली |


क्या लोग थे वो दीवाने क्या लोग थे वो अभिमानी,

जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुरबानी |


कोई सिख कोई जाट मराठा कोई गुरखा कोई मद्रासी,

सरहद पर मरनेवाला हर वीर था भारतवासी |


जो खून गिरा पर्वत पर वो खून था हिंदुस्तानी,

जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुरबानी |


थी खून से लथ-पथ काया फिर भी बंदूक उठाके,

दस-दस को एक ने मारा फिर गिर गए होश गँवा के |


जब अंत-समय आया तो कह गए के अब मरते हैं,

खुश रहना देश के प्यारों अब हम तो सफ़र करते हैं |


थे धन्य जवान वो अपने थी धन्य वो उनकी जवानी,

जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुरबानी |


जय हिंद ! जय हिंद की सेना !

जय हिंद ! जय हिंद ! जय हिंद !


11. Swatantata स्वतन्त्रता | Desh Bhakti Kavita

--- रामनरेश त्रिपाठी


एक घड़ी की भी परवशता कोटि नरक के सम है। 

पलभर की भी स्वतंत्रता सौ स्वर्गों से उत्तम है। 

जब तक जग में मान तुम्हारा तब तक जीवन धारो। 

जब तक जीवन है शरीर में तब तक धर्म न हारो॥ 


जब तक धर्म तभी तक सुख है, सुख में कर्म न भूलो। 

कर्म-भूमि में न्याय-मार्ग पर छाया बनकर फूलो। 

जहाँ स्वतंत्र विचार न बदलें मन से आकर मुख में। 

बने न बाधक शक्तिमान जन जहाँ निबल के सुख में॥ 


निज उन्नति का जहाँ सभी जन को समान अवसर हो। 

शांतिदायिनी निशा और आनंद-भरा वासर हो। 

उसी सुखी स्वाधीन देश में मित्रो! जीवन धारो। 

अपने चारु चरित से जग में प्राप्त करो फल चारो॥


12. Veer Jawan वीर जवान | Desh Bhakti Kavita

--- कविता भट्ट


लौहस्तम्भ-सा

खड़ा एक मानव

हाड़ कँपाती

जो शीत- शिशिर में

बर्फीली हवा,

रात- दोपहर में

चुभती धूप

या अंध तिमिर में

सहता जाता

इसमें भी तो हैं ही

संवेदनाएँ

इसे भी तड़पाती

हैं वेदनाएँ

यद्यपि, कालगति

किन्तु, तथापि

न विचलित होता

अश्रु बहाता,

न कभी भी रोता;

मातृभूमि के

उर- माल सजाने,

गौरव- मोती

साहस के धागे में

सदा पिरोता

विजय-इतिहास

अपने सारे

यह बलि चढ़ाता

रक्त-संबंध

है राष्ट्र-परिवार

इसका सारा,

भारत का महान

वीर जवान

कविता नित करे

दण्डवत प्रणाम.


13. 15 august 1947 पन्द्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस | Desh Bhakti Kavita

--- सुमित्रानंदन पंत


नव स्वतंत्र भारत, हो जग-हित ज्योति जागरण,

नव प्रभात में स्वर्ण-स्नात हो भू का प्रांगण !

नव जीवन का वैभव जाग्रत हो जनगण में,

आत्मा का ऐश्वर्य अवतरित मानव मन में!

रक्त-सिक्त धरणी का हो दु:स्वप्न समापन,

शान्ति प्रीति सुख का भू-स्वर्ग उठे सुर मोहन!

भारत का दासत्व दासता थी भू-मन की,

विकसित आज हुई सीमाएँ जग-जीवन की!

धन्य आज का स्वर्ण दिवस, नव लोक-जागरण!

नव संस्कृति आलोक करे, जन भारत वितरण!

नव-जीवन की ज्वाला से दीपित हों दिशि क्षण,

नव मानवता में मुकुलित धरती का जीवन !


14. Pyare Bharat Desh प्यारे भारत देश | Desh Bhakti Kavita

--- माखनलाल चतुर्वेदी 


प्यारे भारत देश

गगन-गगन तेरा यश फहरा

पवन-पवन तेरा बल गहरा

क्षिति-जल-नभ पर डाल हिंडोले

चरण-चरण संचरण सुनहरा


ओ ऋषियों के त्वेष

प्यारे भारत देश।।


वेदों से बलिदानों तक जो होड़ लगी

प्रथम प्रभात किरण से हिम में जोत जागी

उतर पड़ी गंगा खेतों खलिहानों तक

मानो आँसू आये बलि-महमानों तक


सुख कर जग के क्लेश

प्यारे भारत देश।।


तेरे पर्वत शिखर कि नभ को भू के मौन इशारे

तेरे वन जग उठे पवन से हरित इरादे प्यारे!

राम-कृष्ण के लीलालय में उठे बुद्ध की वाणी

काबा से कैलाश तलक उमड़ी कविता कल्याणी

बातें करे दिनेश

प्यारे भारत देश।।


जपी-तपी, संन्यासी, कर्षक कृष्ण रंग में डूबे

हम सब एक, अनेक रूप में, क्या उभरे क्या ऊबे

सजग एशिया की सीमा में रहता केद नहीं

काले गोरे रंग-बिरंगे हममें भेद नहीं


श्रम के भाग्य निवेश

प्यारे भारत देश।।


वह बज उठी बासुँरी यमुना तट से धीरे-धीरे

उठ आई यह भरत-मेदिनी, शीतल मन्द समीरे

बोल रहा इतिहास, देश सोये रहस्य है खोल रहा

जय प्रयत्न, जिन पर आन्दोलित-जग हँस-हँस जय बोल रहा,


जय-जय अमित अशेष

प्यारे भारत देश।।


15. Lalkar ललकार | Desh Bhakti Kavita

--- वहीद


तूने गर ठान लिया जुल्म ही करने के लिए,

हम भी तैयार हैं अब जी से गुज़रने के लिए।


अब नहीं हिंद वह जिसको दबाए बैठे थे,

जाग उठे नींद से, हां हम तो सम्हलने के लिए।


हाय, भारत को किया तूने है ग़ारत कैसा!

लूटकर छोड़ दिया हमको तो मरने के लिए।


भीख मंगवाई है दर-दर हमंे भूखा मारा,

हिंद का माल विलायत को ही भरने के लिए।


लाजपत, गांधी व शौकत का बजाकर डंका,

सीना खोले हैं खड़े गोलियां खाने के लिए।


तोप चरख़े की बनाकर तुम्हें मारेंगे हम,

अब न छोड़ेंगे तुम्हें फिर से उभरने के लिए।


दास, शौकत व मुहम्मद को बनाकर कै़दी,

छेड़ा है हिंद को अब सामना करने के लिए।


बच्चे से बूढ़े तलक आज हैं तैयार सभी,

डाल दो हथकड़ियां जेल को भरने के लिए।


उठो, आओ, चलो, अब फौज में भर्ती हो लो!

भारत-भूमि का भी तो कुछ काम करने के लिए।


ख़ां साहब और राय बहादुर की पदवी लेकर,

जी-हुजूरी और गुलामी ही है करने के लिए।


ईश्वर से प्रार्थना करता है यही आज ‘वहीद’,

शक्ति मिल जाए हमें देश पे मरने के लिए।


16. Mera Watan Wohi Hai मेरा वतन वही है | Desh Bhakti Kavita

--- अल्लमा मोहम्मद इक़बाल


चिश्ती ने जिस ज़मीं पे पैग़ामे हक़ सुनाया,

नानक ने जिस चमन में बदहत का गीत गाया,

तातारियों ने जिसको अपना वतन बनाया,

जिसने हेजाजियों से दश्ते अरब छुड़ाया,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥


सारे जहाँ को जिसने इल्मो-हुनर दिया था,

यूनानियों को जिसने हैरान कर दिया था,

मिट्टी को जिसकी हक़ ने ज़र का असर दिया था

तुर्कों का जिसने दामन हीरों से भर दिया था,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥


टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमां से,

फिर ताब दे के जिसने चमकाए कहकशां से,

बदहत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकां से,

मीरे-अरब को आई ठण्डी हवा जहाँ से,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥


बंदे किलीम जिसके, परबत जहाँ के सीना,

नूहे-नबी का ठहरा, आकर जहाँ सफ़ीना,

रफ़अत है जिस ज़मीं को, बामे-फलक़ का ज़ीना,

जन्नत की ज़िन्दगी है, जिसकी फ़िज़ा में जीना,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥


गौतम का जो वतन है, जापान का हरम है,

ईसा के आशिक़ों को मिस्ले-यरूशलम है,

मदफ़ून जिस ज़मीं में इस्लाम का हरम है,

हर फूल जिस चमन का, फिरदौस है, इरम है,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥


17. Sare Jahan Se Accha सारे जहाँ से अच्छा | Desh Bhakti Kavita

--- मुहम्मद इक़बाल


सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा॥


ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में।

समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा॥ 


परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का।

वो संतरी हमारा, वो पासबाँ हमारा॥ 


गोदी में खेलती हैं, उसकी हज़ारों नदियाँ।

गुलशन है जिनके दम से, रश्क-ए-जिनाँ हमारा॥ 


ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको।

उतरा तेरे किनारे, जब कारवाँ हमारा॥ 


मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।

हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्ताँ हमारा॥ 


यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से।

अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा॥ 


कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा॥ 


'इक़बाल' कोई महरम, अपना नहीं जहाँ में।

मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहाँ हमारा॥ 


18. Gandhi Ke Desh Mein गांधी के देश में | Desh Bhakti Kavita

--- विपिन कुमार शर्मा


हमारे गाल पर

नहीं मारता अब तमाचा कोई

कि हम

तपाक से दूसरा गाल बढ़ा दें


अब तो चुभते हैं

उनके पैने दाँत

खच्च से हमारी गर्दन पर

और उनकी सहस्त्र जिह्वाएँ

लपलपा उठती हैं

फ़व्वारे की तरह चीत्कार करते खून पर


गांधी के इस देश में

हमें

ज़्यादा से ज़्यादा स्वस्थ होना होगा

ताकि हम उनकी खून की हवस बुझा सकें

या

उनकी यह आदत ही छुड़ा सकें॥

 Desh Bhakti Poem In Hindi


19. Yeh Hai Bharat Desh Hamara यह है भारत देश हमारा | Desh Bhakti Kavita

--- सुब्रह्मण्यम भारती 


चमक रहा उत्तुंग हिमालय, यह नगराज हमारा ही है।

जोड़ नहीं धरती पर जिसका, वह नगराज हमारा ही है।

नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस धारा,

बहती है क्या कहीं और भी, ऎसी पावन कल-कल धारा?


सम्मानित जो सकल विश्व में, महिमा जिनकी बहुत रही है

अमर ग्रन्थ वे सभी हमारे, उपनिषदों का देश यही है।

गाएँगे यश ह्म सब इसका, यह है स्वर्णिम देश हमारा,

आगे कौन जगत में हमसे, यह है भारत देश हमारा।


यह है भारत देश हमारा, महारथी कई हुए जहाँ पर,

यह है देश मही का स्वर्णिम, ऋषियों ने तप किए जहाँ पर,

यह है देश जहाँ नारद के, गूँजे मधुमय गान कभी थे,

यह है देश जहाँ पर बनते, सर्वोत्तम सामान सभी थे।


यह है देश हमारा भारत, पूर्ण ज्ञान का शुभ्र निकेतन,

यह है देश जहाँ पर बरसी, बुद्धदेव की करुणा चेतन,

है महान, अति भव्य पुरातन, गूँजेगा यह गान हमारा,

है क्या हम-सा कोई जग में, यह है भारत देश हमारा।


विघ्नों का दल चढ़ आए तो, उन्हें देख भयभीत न होंगे,

अब न रहेंगे दलित-दीन हम, कहीं किसी से हीन न होंगे,

क्षुद्र स्वार्थ की ख़ातिर हम तो, कभी न ओछे कर्म करेंगे,

पुण्यभूमि यह भारत माता, जग की हम तो भीख न लेंगे।


मिसरी-मधु-मेवा-फल सारे, देती हमको सदा यही है,

कदली, चावल, अन्न विविध अरु क्षीर सुधामय लुटा रही है,

आर्य-भूमि उत्कर्षमयी यह, गूँजेगा यह गान हमारा,

कौन करेगा समता इसकी, महिमामय यह देश हमारा।


20. Matribhumi मातृभूमि | Desh Bhakti Kavita

--- मैथिलीशरण गुप्त


नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है।

सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥

नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।

बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥

करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।

हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं।

घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥

परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।

जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥

हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।

हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?

पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा।

तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?

तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।

बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥

फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।

हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥

निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है।

शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥

षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है।

हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥

शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।

हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥

सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं।

भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥

औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली।

खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥

जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।

हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥

क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है।

सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है॥

विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है।

भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥

हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।

हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥

जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे।

उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥

लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे।

उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥

उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।

होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥


21. Bharat Zameen Ka Tukda Nahi भारत जमीन का टुकड़ा नहीं | Desh Bhakti Kavita

--- अटल बिहारी वाजपेयी


भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,

जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।

हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,

पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।

पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।

कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।

यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,

यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।

इसका कंकर-कंकर शंकर है,

इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।

हम जियेंगे तो इसके लिये

मरेंगे तो इसके लिये।


22. Jhanda Uncha Rahe Hamara झंडा ऊंचा रहे हमारा | Desh Bhakti Kavita

--- श्यामलाल गुप्त पार्षद


विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।

सदा शक्ति बरसाने वाला,

प्रेम सुधा सरसाने वाला

वीरों को हरषाने वाला

मातृभूमि का तन–मन सारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।


स्वतंत्रता के भीषण रण में,

लखकर जोश बढ़े क्षण–क्षण में,

काँपे शत्रु देखकर मन में,

मिट जावे भय संकट सारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।


इस झंडे के नीचे निर्भय,

हो स्वराज जनता का निश्चय,

बोलो भारत माता की जय,

स्वतंत्रता ही ध्येय हमारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।


आओ प्यारे वीरों आओ,

देश–जाति पर बलि–बलि जाओ,

एक साथ सब मिलकर गाओ,

प्यारा भारत देश हमारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।


इसकी शान न जाने पावे,

चाहे जान भले ही जावे,

विश्व–विजय करके दिखलावे,

तब होवे प्रण–पूर्ण हमारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।


23. Phaansi फांसी  | Desh Bhakti Kavita

--- प्रणयेश शर्मा


बधिक! तुम पहना दो जयमाल।

प्रमुदित मन जीवन से नाता,

तोड़ चुका इस काल।


अस्ताचल के श्याम शिखर पर,

छवि विहीन बेहाल।

दिन-मणि देख रहा है मुझको,

अब दो फंदा डाल।


जिस पथ पर आरूढ़ हुआ मैं,

यद्यपि वह विकराल।


किंतु इसी पथ पर चलने में,

मिलती विजय विशाल।


भूल गया था, भटक रहा था,

देख विश्व-भ्रम जाल।


नत मस्तक हो धूल-धूसरित,

कर लूं उन्नत भाल।


चर्म चक्षु है बंद-

देखता हृदय-हृदय की चाल।


पल-पल पर प्रणयेश सुन रहा,

सर्वनाश की ताल।


24. Hame Mili Azadi हमें मिली आज़ादी | Desh Bhakti Kavita

--- सजीवन मयंक


आज तिरंगा फहराता है अपनी पूरी शान से।

हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

आज़ादी के लिए हमारी लंबी चली लड़ाई थी।

लाखों लोगों ने प्राणों से कीमत बड़ी चुकाई थी।।

व्यापारी बनकर आए और छल से हम पर राज किया।

हमको आपस में लड़वाने की नीति अपनाई थी।।

हमने अपना गौरव पाया, अपने स्वाभिमान से।

हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

गांधी, तिलक, सुभाष, जवाहर का प्यारा यह देश है।

जियो और जीने दो का सबको देता संदेश है।।

प्रहरी बनकर खड़ा हिमालय जिसके उत्तर द्वार पर।

हिंद महासागर दक्षिण में इसके लिए विशेष है।।

लगी गूँजने दसों दिशाएँ वीरों के यशगान से।

हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

हमें हमारी मातृभूमि से इतना मिला दुलार है।

उसके आँचल की छैयाँ से छोटा ये संसार है।।

हम न कभी हिंसा के आगे अपना शीश झुकाएँगे।

सच पूछो तो पूरा विश्व हमारा ही परिवार है।।

विश्वशांति की चली हवाएँ अपने हिंदुस्तान से।

हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।


25. Shahid शहीद | Desh Bhakti Kavita

--- खुजंदी


शहीदों के ख़ूं का असर देख लेना,

मिटाएंगे ज़ालिम का घर, देख लेना।


किसी के इशारों के हम मुंतज़िर हैं,

बहा देंगे ख़ूं की नहर, देख लेना।


झुका देंगे गर्दन को हम ज़ेरे-ख़ंजर,

ख़ुशी से कटाएंगे सर, देख लेना।


जो ख़ुदग़र्ज़ गोली चलाएंगे हम पर,

तो क़दमों में उनका ही सर देख लेना।


जो नख़्ल हमने सींचा है ख़ूने-जिगर से,

वो होगा कभी बाग़बर, देख लेना।


किनारे लगेगी भंवर से ये किश्ती,

वो आएगी एक दिन लहर, देख लेना।


बलाएं ये जाएंगी ख़ुद सरनगूं हो,

नहीं होगी इनकी गुज़र, देख लेना।


‘खुजंदी’ हुआ हिंद आज़ाद अपना,

छपेगी ये एक दिन ख़बर देख लेना।


26. Hum Honge Kamyab हम होंगे कामयाब | Desh Bhakti Kavita

--- गिरिजाकुमार माथुर


होंगे कामयाब, होंगे कामयाब

हम होंगे कामयाब एक दिन

हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

हम होंगे कामयाब एक दिन


होंगी शांति चारो ओर

होंगी शांति चारो ओर

होंगी शांति चारो ओर एक दिन

हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

होंगी शांति चारो ओर एक दिन


हम चलेंगे साथ-साथ

डाल हाथों में हाथ

हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन

हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन


नहीं डर किसी का आज

नहीं भय किसी का आज

नहीं डर किसी का आज के दिन

हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

नहीं डर किसी का आज के दिन


हम होंगे कामयाब एक दिन


27. Vande Mataram वंदे मातरम् | Desh Bhakti Kavita

--- बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय


वन्दे मातरम्

सुजलां सुफलाम्

मलयजशीतलाम्

शस्यश्यामलाम्

मातरम्।


शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्

फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्

सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्

सुखदां वरदां मातरम्॥ १॥


कोटि कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले

कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,

अबला केन मा एत बले।

बहुबलधारिणीं

नमामि तारिणीं

रिपुदलवारिणीं

मातरम्॥ २॥


तुमि विद्या, तुमि धर्म

तुमि हृदि, तुमि मर्म

त्वम् हि प्राणा: शरीरे

बाहुते तुमि मा शक्ति,

हृदये तुमि मा भक्ति,

तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे॥ ३॥


त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी

कमला कमलदलविहारिणी

वाणी विद्यादायिनी,

नमामि त्वाम्

नमामि कमलाम्

अमलां अतुलाम्

सुजलां सुफलाम्

मातरम्॥४॥


वन्दे मातरम्

श्यामलाम् सरलाम्

सुस्मिताम् भूषिताम्

धरणीं भरणीं

मातरम्॥ ५॥


28. Ekla Cholo Re एकला चलो रे  | Desh Bhakti Kavita

--- रबीन्द्रनाथ ठाकुर


तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे


तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे


यदि कोई भी ना बोले ओरे ओ रे ओ अभागे कोई भी ना बोले

यदि सभी मुख मोड़ रहे सब डरा करे

तब डरे बिना ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे

ओ तू मुक्तकंठ अपनी बात बोल अकेला रे


तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे


यदि लौट सब चले ओरे ओ रे ओ अभागे लौट सब चले

यदि रात गहरी चलती कोई गौर ना करे

तब पथ के कांटे ओ तू लहू लोहित चरण तल चल अकेला रे


तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे


यदि दिया ना जले ओरे ओ रे ओ अभागे दिया ना जले

यदि बदरी आंधी रात में द्वार बंद सब करे

तब वज्र शिखा से तू ह्रदय पंजर जला और जल अकेला रे

ओ तू हृदय पंजर चला और जल अकेला रे


तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

Desh Bhakti Poem In Hindi


29. Kadam Kadam Badhaye Ja कदम कदम बढ़ाये जा | Desh Bhakti Kavita

--- राम सिंह ठाकुर


कदम कदम बढ़ाये जा, खुशी के गीत गाये जा

ये जिन्दगी है क़ौम की, तू क़ौम पे लुटाये जा

शेर-ए-हिन्द आगे बढ़, मरने से फिर कभी ना डर

उड़ाके दुश्मनों का सर, जोशे-वतन बढ़ाये जा

कदम कदम बढ़ाये जा …

हिम्मत तेरी बढ़ती रहे, खुदा तेरी सुनता रहे

जो सामने तेरे खड़े, तू ख़ाक मे मिलाये जा

कदम कदम बढ़ाये जा …

चलो दिल्ली पुकार के, क़ौमी निशां सम्भाल के

लाल किले पे गाड़ के, लहराये जा लहराये जा

कदम कदम बढ़ाये जा…


30. Bharatmata भारतमाता | Desh Bhakti Kavita

--- सुमित्रानंदन पंत


भारत माता

ग्रामवासिनी।

खेतों में फैला है श्यामल

धूल भरा मैला सा आँचल,

गंगा यमुना में आँसू जल,

मिट्टी कि प्रतिमा

उदासिनी।


दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,

अधरों में चिर नीरव रोदन,

युग युग के तम से विषण्ण मन,

वह अपने घर में

प्रवासिनी।


तीस कोटि संतान नग्न तन,

अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन,

मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,

नत मस्तक

तरु तल निवासिनी!


स्वर्ण शस्य पर -पदतल लुंठित,

धरती सा सहिष्णु मन कुंठित,

क्रन्दन कंपित अधर मौन स्मित,

राहु ग्रसित

शरदेन्दु हासिनी।


चिन्तित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित,

नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,

आनन श्री छाया-शशि उपमित,

ज्ञान मूढ़

गीता प्रकाशिनी!


सफल आज उसका तप संयम,

पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम,

हरती जन मन भय, भव तम भ्रम,

जग जननी

जीवन विकासिनी।


31. Bharatvarsh भारतवर्ष | Desh Bhakti Kavita

--- जयशंकर प्रसाद


हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार

उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार ।


जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक

व्योम-तम पुँज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक ।


विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत

सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत ।


बचाकर बीज रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत

अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ पर हम बढ़े अभीत ।


सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता विकास

पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास ।


सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह

दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह ।


धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद

हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद ।


विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम

भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम ।


यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि

मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि ।


किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं

हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं ।


जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ी, प्रचंड समीर

खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर ।


चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न

हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न ।


हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव

वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा मे रहती थी टेव ।


वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान

वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-संतान ।


जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष

निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष।।


32. Desh Bhakti Poem Status देश भक्ति कविता स्टेटस | Desh Bhakti Poem In Hindi


i) आजादी के साल हुए कई


आजादी के साल हुए कई

पर क्या हमने पाया है

सोचा था क्या होगा लेकिन


सामने पर क्या आया है

रामराज्य-सा देश हो अपना

बापू का था सपना


चाचा बोले आगे बढ़ कर

कर लो सबको अपना

आजादी फिर छीने ना अपनी


दिया शास्त्री ने नारा

जय-जयकार किसान की अपनी

जय जवान हमारा


सोचो इनके सपनो को हम

कैसे साकार करेंगे

भ्रष्टाचार हटा देंगे हम


आगे तभी बढेंगे

मुश्किल नहीं पूरा करना

इन सपनों का भारत


अपने अन्दर की शक्ति को

करो अगर तुम जाग्रत

आओ मिलकर कसम ये खाए


ऐसा सभी करेंगे

शिक्षित हो अगर हर बच्चा

उन्नति तभी हम करेंगे


ii) लाखो बलिदान करोडो अरमान के बाद


लाखो बलिदान करोडो अरमान के बाद

आया वो दिन

15 अगस्त 1947

लोग कहते है


भारत आजाद हुआ था इस दिन

पर क्या भारत को मिली आजादी

आजादी तो हिन्दू, मुस्लमान, सिख

और सभी धर्मवलंबियो को मिली

बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र तमिलनाडु


और अनगिनत प्रांतो को मिली

पर क्या भारत को मिली आजादी

आजादी के जश्न में हिन्दुओ ने होली

खेली मुसलमानों ने ईद मनाई

इसियो ने इस्टर तो सिखों ने


भांगड़ा पाया

सब अपने धर्म की धुनी रमाते

खुद को उच्च दुसरे को तुच्छ बताते

आज हो गए है दूर इतना

की मिल गया वैर वैमनस्य को नया


घर आपना

मै पंजाबी, मै मराठा, मै बंगला, मै गुजरती

सबने बना ली है अपनी नई पहचान

शायद न रहा इन्हें अब

“भारत’’ शब्द का भी मान


खुद को आज भी जकड़ा देख

धर्म प्रांत की बेड़ियों में

भारत यही सोचती यही पूछती होगी

हम सब से

क्या मुझको मिली आजादी


कहते है अंग्रेजो ने भारत को

कुछ इस कदर लुटा की

सोने की चिड़िया का रंग हुआ कलूटा

यह आधी सच्चाई है अंग्रेजो ने तो

चिड़िया को बस किया था अपंग


उसे कला करने की जहमत

खुद हमे उठाई है

मस्जिदों के अजान में कही

गुम हो गया है राष्ट्रगान

लोग अदब से झुकते है


प्राथर्ना और फरियाद में

पर खड़ा ना हो पाते

कुछ पल राष्ट्रगान के सम्मान में

मुझे था बस यही कहना

कर दो आजाद अब बेड़ियाँ चुभती होंगी


“भारत माँ’’ की सिसकियाँ हमसे यही

कहती होंगी

धर्म और प्रांत से बड़ी होती है राष्ट्रीयता

तुम्हारा प्रांत है सारा भारत

धर्म तुम्हारी भारतीयता. मंदिरों की प्रार्थना


iii) वीर तुम बड़े चलो


वीर तुम बड़े चलो

धीर तुम बड़े चलो

हाथ में ध्वजा रहे

बाल-दल सजा रहे

ध्वज कभी झुके नहीं


दल कभी रुके नहीं

वीर तुम बड़े चलो

धीर तुम बड़े चलो

सामने पहाड़ हो

सिंह का दहाड़ हो


तुम निडर हटो नहीं

तुम निडर डटो वही

वीर तुम बड़े चलो

धीर तुम बड़े चलो

मेघ गरजते रहे


मेघ बरसते रहे

बिजलियाँ कड़क उठे

बिजलियाँ तडके उठे

वीर तुम बड़े चलो

धीर तुम बड़े चलो


प्रात हो की रात हो

संग हो ना साथ हो

सूर्या से बड़े चलो

चंद्र से बड़े चलो

वीर तुम बड़े चलो


धीर तुम बड़े चलो

एक ध्वज लिए हुए

एक प्रण किये हुए

मातृ भूमि के लिए

पितृ भूमि के लिए


वीर तुम बड़े चलो

धीर तुम बड़े चलो

अन्न भूमि में भरा

वारि भूमि में भरा

यत्र कर निकाल लो


रत्र भर निकाल लो

वीर तुम बड़े चलो

धीर तुम बड़े चलो


जग में सुंदर देश हमारा

अपना भारत है हमे

अपने प्राणों से प्यारा

नदी, खेत, बाग़ और वन


देते है सुंदर जीवन

यहाँ है खुबसूरत

पर्वतो का नजारा

जग में सुंदर देश हमारा


राम, कृष्ण, गौतम और गाँधी का देश

यहाँ है काले, गोरे

सभी रंग विशेष

बहती पवित्र नदियाँ गंगा, यमुना और नर्मदा


करती है सिंचित जीवन सर्वदा

चलती रहे ये जीवन धार

जग में सुंदर देश हमारा

हिन्दू, मुस्लिम, सिख और इसाई


हर धर्म के लोग अनेक

मानवता ही धर्म हमारा

जिस-से बने हुए है हम सब एक’

काले गोरे में भेद नहीं


हम सब में मतभेद नहीं

बना हुआ है हम

सब में भाईचारा

जग में सुंदर देश हमारा


हमारे देश की है यही संस्कृति

ईद, दिवाली, होली, क्रिश्मस

सब त्यौहार है लोग मानते

मिल जुल कर है सब गाते


सुंदर राष्ट्र गीत और राष्ट्र गान प्यारा

जग में सुंदर देश हमारा

अपना भारत है हमे

अपने प्राणों से प्यारा…


iv) अपना झंडा हमको ज्यादा प्यारा


अपना झंडा हमको ज्यादा, प्यारा

अपनी जान से

युगों – युगों तक लहराएगा, सदा

तिरंगा शान से


केसरिया रंग है झंडे में

शौर्य, वीरता, त्याग का

हरा रंग है खुशहाली और,

जन – जन के अनुराग का


सफ़ेद रंग तो सदा चाहता, सबको

शांति जहान से’

अपना झंडा हमको ज्यादा, प्यारा

अपनी जान से


इस झंडे के साथ देश का

स्वाभिमान भी ऊँचा है

कसम हमे ना होने देंगे

इस झंडे को नीचा है


नीला चक्र मध्य में कहता, बढे

प्रगति-रथ शान से

अपना झंडा हमको ज्यादा, प्यारा

अपनी जान से


इस झंडे का मान बढाने

प्राण दिए है वीरो ने

पा आजादी लाला किले पर

फहराया रणधीरों ने


झंडा गीतों की स्वर लहरी

गूंजे दूर वितान से

अपना झंडा हमको ज्यादा, प्यारा

अपनी जान से


v) भारत तुझसे मेरा नाम है, भारत तू ही मेरा धाम है


भारत तुझसे मेरा नाम है,

भारत तू ही मेरा धाम है|

भारत मेरी शोभा शान है,

भारत मेरा तीर्थ स्थान है|

भारत तू मेरा सम्मान है,

भारत तू मेरा अभिमान है|

भारत तू धर्मो का ताज है,

भारत तू सबका समाज है|

भारत तुझमें गीता सार है,

भारत तू अमृत की धार है|

भारत तू गुरुओं का देश है,

भारत तुझमें सुख सन्देश है|

भारत जबतक ये जीवन है,

भारत तुझको ही अर्पण है|

भारत तू मेरा आधार है,

भारत मुझको तुझसे प्यार है|

भारत तुझपे जा निसार है,

भारत तुझको नमस्कार है|


vi) तुम रहते हो जब बॉर्डर पर


तुम रहते हो जब बॉर्डर पर,

हम घर में दिवाली मनाते है,

तुम सहते हो दुश्मन के धमाकों को

हम बेबजह ही न जाने कितने

बम पटाखों से प्रदूषण बढ़ाते है।।

तुम बहादुर जोशीले जिंदादिल

हम पागल लापरवाह बढ़ाते मुश्किल

फेंक के कूड़ा इधर उधर

भारत को अस्वच्छ बनाते है।।

तुम रहते हो जब बॉर्डर पर,

हम घर में होली मनाते है

तुम भीग जाते हो रक्त से खाकर गोली

हम डालकर रंग बेबजह ही

हज़ारों गैलन पानी फैलाते है।

तुम लड़ते हो देश को एक समझकर

हम छोटी छोटी बातों पर ही

साम्प्रदायिक दंगे कर जाते है।।

तुम कितने बफादार तुम कितने समझदार

एक हम है जो राष्ट्र प्रेम का

असली मतलब समझ नही पाते है।

तुम रहते हो जब बॉर्डर पर

तब हम सुकून से जी पाते है।


Desh Bhakti Kavita | Desh Bhakti Poem In Hindi

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